बराबर टायर साइज़ और ±3% नियम
कभी-कभी आपकी कार के फ़ैक्ट्री साइज़ का टायर नहीं मिलता, या आप बड़ा रिम लगवाना चाहते हैं। ऐसे में "बराबर" साइज़ यानी ऐसा दूसरा साइज़ इस्तेमाल होता है जिसका कुल व्यास फ़ैक्ट्री टायर के बहुत करीब हो। बराबर साइज़ चुनते समय बुनियादी नियम यह है: नए टायर का कुल व्यास फ़ैक्ट्री टायर के कुल व्यास से ज़्यादा से ज़्यादा 3% अलग होना चाहिए। कई टायर विशेषज्ञ ज़्यादा सुरक्षित सीमा के तौर पर 2% की सलाह देते हैं।
कुल व्यास क्यों ज़रूरी है?
कार का स्पीडोमीटर और ABS, ESP व लेन कीपिंग जैसे सिस्टम फ़ैक्ट्री टायर के हिसाब से गणना करते हैं कि पहिया एक चक्कर में कितने मीटर चलता है। कुल व्यास बदलने पर:
- स्पीडोमीटर गलत दिखाता है। बड़े टायर के साथ कार स्पीडोमीटर से ज़्यादा तेज़ चलती है।
- ओडोमीटर गड़बड़ाता है। सर्विस अंतराल और वारंटी ट्रैकिंग पर असर पड़ता है।
- ABS और ESP गलत डेटा के साथ काम कर सकते हैं। ख़ासकर हर एक्सल पर अलग व्यास इस्तेमाल हो तो सिस्टम चेतावनी दे सकता है।
- फ़ेंडर से रगड़ने का ख़तरा बनता है। बड़ा व्यास और चौड़ाई, स्टीयरिंग पूरा घुमाने पर अंदर के आर्च लाइनर को छू सकते हैं।
कुल व्यास कैसे निकालें?
मीट्रिक साइज़ वाले टायर का कुल व्यास इस फ़ॉर्मूले से निकलता है:
कुल व्यास (mm) = 2 × चौड़ाई × (प्रोफ़ाइल ÷ 100) + रिम इंच × 25.4
उदाहरण: 205/55 R16
- साइडवॉल ऊँचाई: 205 × 0.55 = 112.75 mm
- दो साइडवॉल: 2 × 112.75 = 225.5 mm
- रिम: 16 × 25.4 = 406.4 mm
- कुल व्यास: 631.9 mm
तीन विकल्पों की तुलना
| साइज़ | कुल व्यास | अंतर | स्थिति |
|---|---|---|---|
| 205/55 R16 (फ़ैक्ट्री) | 631.9 mm | — | संदर्भ |
| 195/65 R15 | 634.5 mm | +0.4% | ठीक |
| 225/45 R17 | 634.3 mm | +0.4% | ठीक |
| 225/40 R18 | 637.2 mm | +0.8% | ठीक |
| 215/60 R16 | 664.4 mm | +5.1% | ठीक नहीं |
टेबल के पहले तीन विकल्प कुल व्यास के हिसाब से मेल खाते हैं। लेकिन सिर्फ़ यह काफ़ी नहीं है। हर साइज़ को आपकी कार के रिम और फ़ेंडर की बनावट में फ़िट होना चाहिए, और लोड इंडेक्स भी फ़ैक्ट्री मान से कम नहीं होना चाहिए।
स्पीडोमीटर कितना गलत दिखाएगा?
कुल व्यास में प्रतिशत अंतर लगभग स्पीड के अंतर के बराबर होता है। टायर 3% बड़ा है तो स्पीडोमीटर पर 100 km/h दिखने पर आपकी असली स्पीड लगभग 103 km/h होगी। इस अंतर से स्पीड कैमरे पर चालान का ख़तरा बढ़ता है। टायर छोटा है तो उल्टा होता है, कार स्पीडोमीटर से धीमी चलती है।
प्लस साइज़िंग क्या है?
रिम का व्यास एक इंच बढ़ाकर और साइडवॉल अनुपात घटाकर कुल व्यास को बनाए रखना प्लस साइज़िंग कहलाता है। 205/55 R16 से 225/45 R17 पर जाना "+1" और 225/40 R18 पर जाना "+2" माना जाता है। प्लस साइज़िंग के नतीजे:
- ज़्यादा स्पोर्टी लुक और मोड़ पर बेहतर पकड़
- ज़्यादा सख़्त सवारी, गड्ढों में रिम ख़राब होने का ख़तरा बढ़ता है
- आमतौर पर ज़्यादा महँगे टायर और रिम
किन बातों का ध्यान रखें
- लोड इंडेक्स कम न हो। चौड़े और लो-प्रोफ़ाइल टायरों में उतने ही लोड के लिए XL (रीइन्फ़ोर्स्ड) वर्ज़न चाहिए हो सकता है।
- स्पीड क्लास कम न हो। समर टायर में फ़ैक्ट्री स्पीड क्लास से नीचे न जाएँ।
- एक ही एक्सल पर एक ही साइज़ लगाएँ। फ़ोर-व्हील ड्राइव कारों में चारों टायरों का कुल व्यास एक जैसा होना ज़रूरी है।
- रजिस्ट्रेशन और फ़िटनेस जाँच की स्थिति देखें। जो साइज़ फ़ैक्ट्री मंज़ूरी में नहीं हैं, वे फ़िटनेस जाँच में दिक्कत दे सकते हैं। कार के सर्टिफ़िकेट ऑफ़ कन्फ़ॉर्मिटी (COC) में लिखे वैकल्पिक साइज़ सबसे सुरक्षित विकल्प हैं।
Cars-Size के टायर तुलना टूल से आप एक क्लिक में दो साइज़ों के कुल व्यास, चौड़ाई और स्पीडोमीटर का अंतर देख सकते हैं।